जबलपुर समाचार

संगठित अपराधों पर नकेल का संकल्प स्वागत योग्य 

जबलपुर/नरसिंहपुर केसरी- मध्य प्रदेश के गृहमंत्री द्वारा हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में यह कथन दिया है कि प्रदेश में संगठित अपराधियों को हतोत्साहित कर प्रतिबंधित करने हेतु उत्तर प्रदेश शासन के अनुरूप “गैंगस्टर एक्ट” का प्रारूप तैयार किया जायेगा जिसमें उत्तर प्रदेश से भी अधिक कठोरतम दंड के प्रावधान सम्मिलित होंगे शीघ्र ही यह विधान मध्य प्रदेश में प्रभावशील होगा । गैंगस्टर शब्द की उत्पत्ति “गैंग शब्द” से हुई है । गैंग अर्थात अपराधियों का संगठित गिरोह तथा संगठित अपराध का तात्पर्य उक्त संगठित गिरोह द्वारा किये गये अपराध जिन्हें सामान्यतः “ऑर्गेनाइज्ड क्राईम” भी कहा जाता है । प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक अथवा अन्य लाभों के लिए तीन या इससे अधिक व्यक्तियों का संगठित दल जो गंभीर अपराध करने के लिए एकजुट होकर उक्त प्रयोजन से अपराध कारित करते हैं,वे सभी संगठित अपराध हैं । पारराष्ट्रीय संगठित अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन-2000 के अनुसार इस समूह में ऐसे अपराध सम्मिलित हैं जो कम से कम 4 वर्ष के सश्रम कारावास के दंड से दंडित किये जाने योग्य हैं । ये अपराध दो प्रकार के है प्रथम परंपरागत संगठित अपराध जैसे अवैध शराब का धंधा,अपरहण,जबरन वसूली,उद्धापन,डकैती,लूट , ब्लैकमेल,विभिन्न प्रकार के माफिया ( भू एवम खनिज माफिया,आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी व कालाबाज़ारी करने वाले माफिया ) चोरों का गिरोह,व्यवसायिक सशस्त्र गृहभेदन । अपारंपरिक अथवा आधुनिक संगठित अपराधों में मनी लॉन्ड्रिंग,जाली नोटों का छापना व वितरण,हवाला कारोबार,साइबरअपराध,मानव तस्करी,अवैध हथियारों एवं मादक पदार्थों की तस्करी आदि सम्मिलित है। अनेक संगठित अपराधों की वैधानिक परिभाषा बोलचाल की भाषा से भिन्न है उदाहरणार्थ यदि एक से अधिक तत्वों द्वारा बलात्कार किया जाता है तो विधान में उसे गैंगरेप , 4 ( 5 से कम ) व्यक्तियों द्वारा बल प्रयोग कर सांपत्तिक अपराध किया जाता है तो उसे लूट,यही अपराध 5 या अधिक व्यक्तियों द्वारा करने पर उसे डकैती की संज्ञा दी गई है । इसी प्रकार समूह द्वारा चोरी की जाती है तो उस समूह को “चोरों की टोली” कहा जाता है ।संगठित गुंडागर्दी मारपीट ( गैंगवार ) आदि करने पर बलवा के अपराधों का अभियोग चलाया जाता है । 1861 में निर्मित भारतीय दंड विधान ( आई.पी.सी. अथवा ताजीरात-ए-हिंद ) में पूर्व से ही संगठित अपराधों जैसे उद्धापन, अपहरण,लूट,डकैती,बलवा चोरों का गिरोह,व्यवसायिक गृहभेदन , अपराधिक षड्यंत्र,कालाबाज़ारी , ठगी आदि के लिये दण्डात्मक धाराओं में अभियोजन के प्रावधान सम्मिलित हैं।इसके अतिरिक्त समय समय पर भिन्न-भिन्न “विविध अधिनियम” भी सृजित किये गये हैं। पुलिस द्वारा इन अपराधों के समुचित अधिरोपण उपरांत यथोचित अनुसंधान करने पर माननीय न्यायालय द्वारा अभियुक्तों को कठोर कठोर दंड भी दिया जाता है । इनमेंआजीवन कारावास,जीवन पर्यंत तक का कारावास एवं मृत्युदंड से दंडनीय शस्तियाँ भी सम्मिलित हैं ।
संगठित अपराध तथा आतंकवाद के मध्य गहरा संबंध है । आतंकवादी अपने संगठनों के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए संगठित अपराधों का सहारा लेते हैं व अवैध धन संचय करते हैं । आतंकवाद , अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध नेटवर्क की आड़ में फलता फूलता है । संगठित अपराध और आतंकवाद दोनों ऐसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं जहाँ अपेक्षाकृत कम सरकारी नियंत्रण एवम कमजोर प्रशासनिक ढांचा हो । खुली अंतर्राष्ट्रीय सीमा का उपयोग कर आतंकवादी,संगठित अपराध नेटवर्क का इस्तेमाल कर तत्वों को अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करवा कर विभिन्न देशों में भेजते हैं,बदले मे अपने नियंत्रित क्षेत्रों से उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं । संगठित अपराध संगठन और आतंकवादी संगठन दोनों के बीच में सहजीवी संबंध है और वे परस्पर अन्योन्याश्रित हैं । इन संगठनों का यह आपसी संबंध सामान्यतः विकासशील और कम विकसित देशों में अधिक देखने को मिलता है ।
अंग्रेजों द्वारा भारतीय दण्ड विधान का सृजन व प्रयोग अपने शासन के लाभ एवं भारतीयों पर दमनकारी अत्याचार करने हेतु किया जाता रहा है किंतु स्वतंत्रता के पश्चात 75 वर्ष में कतिपय अल्प संशोधन के अतिरिक्त वांछित परिवर्तन करने में हम असमर्थ रहे हैं यहाँ तक की हम अंग्रेजों द्वारा निर्मित पुलिस रेग्युलेशन को भी परिवर्तित नही कर पाये है। समय-समय पर टाडा,मकोका डकैती उन्मूलन अधिनियम , यू.ए.पी.ए , एन.एस.ए आदि का सृजन व प्रयोग किया गया विभिन्न राज्यों अन्य कठोर प्रांतीय अधिनियम भी निर्मित किये जिनका अपराधिक तत्वों पर सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया व उसके धनात्मक परिणाम भी प्राप्त हुये हैं । भारतीय दंड विधान जैसे विशिष्ट विधान अथवा विविध अधिनियमों में की जाने वाली कार्यवाहीयों में आशातीत सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है,जिसका प्रमाण है अपराधिक प्रकरणों में दोषसिद्धी का न्यून प्रतिशत। दोषसिद्धी के न्यून आंकड़ों का कारण निश्चित रूप से पुलिस अनुसंधान की अगुणवत्ता व पुलिस कर्मियों का पर्याप्त व्यवसायिक न होना ही है। पुलिस के पास अब सीमित संसाधन होने का तथ्य अस्वीकार्य है किन्तु कार्य अधिकता से इन्कार नही है। पुलिस का प्राथमिक एवम मूल कार्य है : कानून व्यवस्था बनाये रखना,अपराधों की रोकथाम व अपराध घटित होने पर समुचित अनुसंधान कर दोषियों को अनुपातिक दंड दिलवाना किन्तु वर्तमान परिवेष में बहुआयामी कानून व्यवस्था,विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा,बाजारों-त्योहारों , मेलों-धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था,आये दिन होने वाले चुनावों की व्यस्थता व महामारी में पुलिस की भूमिका आदि के चलते उसका प्रमुख दायित्व गौण हो गया है।अन्य कारणों के अतिरिक्त यह भी एक प्रमुख कारण है कि अपराधियों में “कानून के प्रति भयअपेक्षाकृत कम”हो गया है ।
मध्य प्रदेश प्रांत अन्य राज्यों की तुलना में संगठित अपराधों से कम प्रभावित है किंतु अवैध शराब माफिया,भूमि घोटाले,खनिज माफियाओं द्वारा कारित अपराधों में हम किसी भी राज्य के समकक्ष ही हैं। यद्यपि यह दुस्साहस है किन्तुअपने 36 वर्ष की पुलिस सेवा के अनुभव के आधार पर यह कहना सर्वथा उचित भी है कि चाहे शासन किसी भी दल का क्यों ना हो बिना राजनीतिक,प्रशासनिक अथवा पुलिस संरक्षण के ये संगठित अपराध पनप ही नहीं सकते । ये सरंक्षण स्थानीय व उच्चस्तरीय दोनों स्वरुप के होते हैं । यदि सत्य निष्ठा से विचार किया जाये कि वर्तमान में शराब माफिया,भू माफिया,रेत व अन्य खनिज उत्खनन करने वाले माफिया , जमाखोरी व कालाबाज़ारी करने वाले कौन हैं ? तो मेरे इस कथन की पुष्टि सुनिश्चित है । विशेषकर इन्ही संगठित अपराधों के संबंध में माननीय गृह मंत्री महोदय द्वारा चिंता व्यक्त की जाना प्रतीत होता है । प्रभावी गैंगस्टर एक्ट बनाने एवं संगठित अपराधों की रोकथाम हेतु उनका चिंतन,मंथन,मनन,संकल्प, दृढ़निश्चय स्वागतयोग्य है,किंतु सर्वप्रथम यह नितांत आवश्यक है कि उक्त माफियाओं को प्राप्त तथाकथित प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष राजनीतिक छत्रछाया ( संरक्षण ) तत्काल प्रभाव से पृथक की जाये ।पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों को नियमित प्रशिक्षण देकर उनमें वैधानिक संरक्षण का विश्वास जागृत कर उनका मनोबल बढ़ाया जाये । यह भी विचारणीय है कि पुलिस के कार्यभार को कम करने हेतु व कार्य कुशलता की गुणवत्ता बढ़ाने हेतु मध्य प्रदेश के प्रत्येक पुलिस थाना में स्वीकृत बल की पूर्ति की जाये,अपराध अनुसंधान एवं कानून व्यवस्था हेतु रोटेशनल पृथक पृथक बल ( शाखायें ) निर्धारित किया जाये एवं प्रांत में बहुप्रतीक्षित “पुलिस आयुक्त प्रणाली” भी लागू की जाये । मध्य प्रदेश के वर्तमान कर्तव्यनिष्ठ कुशल व अद्वीतीय पुलिस महानिदेशक विवेक जोहरी के नेतृत्व में यह कार्य अत्यन्त सुगम भी है। निष्कर्ष यह है कि संगठित अपराधों पर नकेल कसने तथा संगठित अपराधियों व उनके गिरोह को प्रतिबंधित करने हेतु पक्षपात रहित,निस्वार्थ राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रबल होना नितांत आवश्यक है जिसके अभाव में किसी भी कानून का समुचित प्रभावशाली होना न केवल संदेहास्पद ही है अपितु “दूर की कौड़ी” भी है।

नरेश शर्मा, राज्य पुलिस सेवा, नगर पुलिस अधीक्षक (से.नि.) , जबलपुर

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