भोपाल

इस दौर में उसूलों की बात करना हिम्मत का काम : मसूद

भोपाल- सरकारी नौकरियों में बड़े ओहदों पर रहते हुए अफसर कई पाबंदियों और बंदिशों से घिरे रहते हैं। अपनी सेवा की मर्यादा में वे अक्सर उन बातों को भी नजरअंदाज और अनदेखा करते नजर आते हैं, जिनके लिए समय पर उठाई गई उनकी आवाज कोई महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती थी। आज के पाबंदियों के दौर में सच, हक और उसूलों की बात कह पाना भी किसी हिम्मतभरे काम से कम नहीं है। या यूं कहिए कि एक बड़ा जोखिम लेने जैसा है। उसूलों और हक की इन्हीं बातों का तानाबाना मिलाकर लिखी गई यह पुस्तक न सिर्फ मुस्लिमों बल्कि सभी उपेक्षित वर्गों के लिए एक नया रास्ता और दिशा खोलेगी। इसके लेखक को इस मायने में बधाई और मुबारकबाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने सरकारी नौकरी की बंदिशों के बीच इस काम को अंजाम दिया है।
मध्य क्षेत्र के विधायक आरिफ मसूद ने यह बात सोमवार को कहीं। वे यहां महाराष्ट्र पुलिस सेवा के अधिकारी अब्दुर्रेमान द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक डेनियल एंड डेप्रीवेशन के रस्म-ए-इजरा (विमोचन) कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कही कि सच्चर कमेटी और रंगनाथन मिश्रा आयोग की रिपोर्ट के वजूद में आने से मुस्लिम समुदाय की तालीम, रोजगार और तरक्की के रास्ते आसान होने की उम्मीद की जा सकती है। इन्हें समय रहते अमल में लाया जाना चाहिए था। इस मौके पर पुस्तक के लेखक आईपीएस अधिकारी अब्दुर्रेमान ने कहा कि पुस्तक में लिखी बातें मेरे मन के काल्पनिक शब्द नहीं हैं, बल्कि यह सरकार, दस्तावेजों, रिपोर्टों और खोजबीन से निकलकर आए शब्दों को समेटे हुए है। उन्होंने बताया कि इससे पहले फरवरी 2019 में इस पुस्तक का विमोचन दिल्ली में हो चुका है। उन्होंने देशभर से अपने ताल्लुकात होने का जिक्र करते हुए कहा कि वे मूलत: बिहार से संबद्ध हैं, उप्र में उनकी तालीम पूरी हुई, महाराष्ट्र में वे सेवाएं दे रहे हैं और अब मप्र की धरती पर अपनी कृति को लेकर पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे कौम और वंचित लोगों को एक राह दिखाने की ललक थी, जो मुझे यहां तक ले आई है। इस पुस्तक से निश्चित तौर पर कई लोगों के लिए तालीम और तरक्की के रास्ते खुल सकेंगे।
जिद के आगे जीत है, साबित किया मैमूना ने
अब्दुर्रेहमान ने अपनी पुस्तक में नरसिंहपुर की एक छात्रा मैमूना का जिक्र भी किया है। उनके गांव से स्कूल की मौजूदगी वाले स्थान तक सड़क मौजूद नहीं थी, जिसकी वजह से यह सफर बड़ा मुश्किल हुआ करता था। मैमूना ने अपने वालिद की इजाजत के साथ इस समस्या को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी लिखना शुरू की। शुरूआत में एक-दो चिट्ठियों का हश्र सरकारी ढर्ऱे पर होने वाले हालात पर ही रहा। लेकिन मैमूना ने अपनी बात कहने को बीच में नहीं छोड़ा और चिट्ठियां लिखने की यह इंतेहा की कि इस मामले को मुख्यमंत्री को खुद देखना भी पड़ा और जरूरी आदेश देकर आनन-फानन में सड़क का निर्माण भी करवाना पड़ा। कार्यक्रम के दौरान मैमूना अपने वालिद के साथ मौजूद थीं। इस मौके पर विशेष अतिथि के तौर उद्योगपति नवाब रजा और रिटायर्ड डीजी एमडब्ल्यु अंसारी, अब्दुल ताहिर ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में बड़ी तादाद में साहित्यिक, शैक्षणिक और सियासी गतिविधियों से ताल्लुक रखने वाले लोग मौजूद थे।
क्या है पुस्तक में
अब्दुर्रेहमान द्वारा लिखित यह पुस्तक  पिछलो बारह वर्षों में आई दो महत्वपूर्ण रिपोर्टों को सहेजे हुए है। इन रिपोर्टों में भारतीय मुस्लमानों और वंचित चेहरों के लिए कई बातें कही गई हैं, लेकिन इनको सही तरीके से अमलीजामा ही नहीं पहनाया गया है।  इन रिपोर्टों में जनसंख्या, शिक्षा जैसे परिणाम संकेतकों के संबंध में वर्तमान परिस्थितियों को प्रस्तुत किया गया है। इसमें अर्थव्यवस्था, गरीबी, बेरोजगारी, खपत स्तर, बैंक ऋण की उपलब्धता, बुनियादी ढाँचा और नागरिक सुविधाएँ और सरकारी रोजगार में प्रतिनिधित्व आदि की बात भी कही गई है। लेखक अब्दुर्रेमान ने समुदाय विशेष के खास मुद्दों जैसे कि उर्दू के उपयोग, मदरसा शिक्षा और वक्फ पर भी अपनी पुस्तक में चर्चा की है। उन्होंने इस पुस्तक में सच्चर समिति की नवंबर 2006 में आई रिपोर्ट का जिक्र भी किया है। साथ ही रंगनाथ मिश्रा आयोगों की रिपोटज़् पर भी विस्तृत प्रकाश डाला है।

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