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स्वच्छता – एक सामाजिक दायित्व

एक प्रसिद्द जापानी कहावत है, – “सुंदरता प्रेम उत्पन्न करती है और, स्वच्छता सुंदरता को स्थायिय्व प्रदान करती है ।“ स्वच्छता का शाब्दिक अर्थ स्वयं को गंदगी से दूर रखना है | स्वयं से तात्पर्य – हम, हमारा शरीर, हमारा घर, हमारा आसपडोस और वृहत सन्दर्भ में – हमारा देश है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताविक, भारत में सफाई और स्वच्छता की कमी के कारण औसतन प्रति व्यक्ति 6500 रूपये व्यर्थ हो जाते हैं । यह एक बहुत बड़ा आंकड़ा है, और निश्चित तौर पर, एक गहन सोच और शोध का विषय भी | आज स्वच्छ भारत अभियान के चलते, देश में स्वच्छता क्रांति के अंकुर फूटे तो जरूर हैं, किन्तु अभी इस दिशा में बहुत किया जाना शेष है | अभी भी हमें अपने आस पास, जहाँ – तहां, गंदगी के ढेर दिखाई दे जाते हैं | यह दिखाता है की हमें, अभी स्वच्छता के क्षेत्र में एक लम्बी यात्रा तय करनी है |
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का कथन है – “जो व्यक्ति अपना घर साफ़ करके कूड़ा बाहर फैलाते है, वो इस देश को गन्दा करता है । जो व्यक्ति स्वच्छता को पसंद करते है वे हर जगह को अपना घर समझते है ।“ महात्मा गाँधी ने सफाई की कीमत 1910–20 के दशक में ही समझ ली थी और उन्होंने इसके महत्त्व पर रोशनी डालते हुए यहाँ तक कहा था कि, स्वच्छता आजादी से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। स्वच्छता वस्तुतः एक आदत है | जिस प्रकार हम अपने घरों में सफाई को उच्च स्थान देते हैं उसी प्रकार हमें अपने घर के बाहर के प्रत्येक कण को स्वच्छता से ओतप्रोत रखना है |
देश के हरेक जगह की साफ़ सफाई, किसी भी सरकार के बूते की बात नहीं हैं | ना तो इतने साधन हैं और ना ही इतने संसाधन और ना ही इतना समय की, देश के प्रत्येक नागरिक द्वारा फैलाई गंदगी को बटोरा जा सके |
प्रसिद्द संस्कृत ग्रन्थ “मनु स्मृति” का एक श्लोक है –
“ अद्भिर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति,
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यति |”
अर्थात शरीर की शुद्धि जल से होती है । मन की शुद्धि सत्य भाषण से होती है । जीवात्मा की शुचिता के मार्ग विद्या और तप हैं । और बुद्धि की स्वच्छता ज्ञानार्जन से होती है |  ज्ञानार्जन से तात्पर्य मन और तन की चेतना को जागरूक करने से है | हम अपने अस पड़ोस की प्रत्येक वस्तु को अपना समझें और उससे प्रेम करें | ना गंदगी फैलाएं ना किसी को गंदगी फैलाने दें |
महान इस्लामिक ग्रन्थ कुरान में वर्णित है -, “ईश्वर स्वच्छ है और स्वच्छता को पसंद करता है और गंदगी से घृणा करता है |” वस्तुतः स्वच्छता, सुन्दर विचारों का आश्रय स्थल है | स्वच्छता से सर्वत्र एक धनात्मक ऊर्जा प्रस्फुटित होती है जो समाज के प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरित करती है | अपने कर्तव्य के प्रति सजग एक नागरिक किसी भी देश की एक अमूल्य संपत्ति है |
हमारी भारतीय संस्कृति में वर्षों से यह मान्यता है कि जहाँ पर सफाई होती है, वहाँ पर लक्ष्मी का वास होता है। हमारे भारत के धर्मग्रन्थों में साफ-सफाई और स्वच्छता के बारे में बहुत से निर्देश दिए गए हैं । लोग पूजा स्थलों को बेहद साफ़ और निर्मल बनाये रखते हैं | लेकिन विडंबना है की पूजा घरों के बाहर गंदगी अपने विराट रूप में विराजमान रहती है | हालांकि यह कहना गलत नहीं होगा की स्थिति में सुधर हुया है | हमें अब जगह जगह ढके हुए डस्टबीन दिखाई दे जाते हैं, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं की अभी बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता है | हमे स्वच्छ रहना है और अपने आसपास को स्वच्छ बनाना है,ऐसी मनोवृत्ति पैदा करना आज की एक महती आवश्यकता है |
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों पर गौर करें तो साफ़ है कि हमारी ज्यादातर बीमारियों के लिये हमारे द्वारा फैलाया गया कूड़ा–कचरा ही जिम्मेदार है। इसी वजह से हमारे नदी–नालों सहित जल स्रोत लगातार प्रदूषित होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि कई जगह हमारा भूगर्भीय जल भंडार भी इससे अछूता नहीं रह पा रहा है। कई स्थानों पर भूमिगत जल स्रोत गन्दा या प्रदूषित पानी उलीच रहे हैं। इनमें उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक पदार्थों को बिना उपचारित किये जमीन में छोड़ देने या नालों में बहा देने जैसी स्थितियाँ भी शामिल हैं। इसके अलावा सीवर के पानी को पेयजल के पानी में मिलने से भी हम नहीं रोक पा रहे हैं। नदियों की सफाई की जगह हम उनमें प्रतिमाएँ और पूजन सामग्री विसर्जित कर रहे हैं। उनके किनारों को हमने सार्वजनिक शौचालयों में बदल दिया है। साल-दर-साल बढ़ते जल संकट से स्थितियाँ और विकराल होती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का स्पष्ट मानना है कि भारत में 80 फीसदी से ज्यादा बीमारियाँ सिर्फ प्रदूषित पानी के कारण ही होती हैं। देश के स्वास्थ्य बजट का करीब 80 फीसदी हिस्सा केवल जलजनित बीमारियों के इलाज और रोकथाम पर ही खर्च होता है। बार–बार पानी उबाल कर पीने के पैगामों के बाद भी अब तक लोग इसे अमल नहीं कर पाते हैं ।
68वें स्वाधीनता-दिवस के अवसर पर माननीय प्रधानमन्त्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी का ‘हर नागरिक के लिए शौचालय’ का आह्वान वास्तव में स्वच्छता के क्षेत्र में उठाया गया पर एक बहुत ही उत्साहजनक निर्णय है | प्रधानमन्त्री ने बड़े औद्योगिक और व्यावसायिक घरानों का आह्वान किया कि वे अपने ‘सामाजिक उत्तरदायित्व’ को समझें और अपने लाभों का एक हिस्सा स्वच्छता-विकास के लिए खर्च करें।
सरकारें कुछ हद तक काम कर सकती हैं पर जब हमारी सरकारें स्वच्छता का निदान कर साफ़-सफाई के काम भी जब खुद करने लगती हैं तो समस्या की भयावहता और भी बढ़ जाती है ।
एक प्रसिद्ध उक्ति है – “हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा |” अगर देश का प्रत्येक नागरिक अपने हिस्से की गंदगी की जिम्मेदारी स्वयं ले तो सम्पूर्ण देश से कचरे का नामोनिशान मिट जायेगा | बस इतना करना है की कचरे को सावधानी पूर्वक इकट्ठा करके ,कचरे वाली गाडी या फिर ढके हुए कचरा घरों में भेज देना है | यह हमारा देश है | इस देश की धरती की पवित्रता और शुचिता का दायित्व हमारा है | देश एक दिन में विकसित नहीं बनता | आज हम अपनी तुलना नेपाल, श्रीलंका और अनेकानेक अफ्रीकी देशों से कर सकते है और अर्थशास्त्र के कई मानकों पर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर सकते हैं, परन्तु यह भी सत्य है की हम अधिकांश विकसित देशों से कई युग पीछे हैं | यह रास्ता लम्बा जरूर है किन्तु असंभव बिलकुल भी नहीं | आईये हम अपनी धरा को स्वच्छ बनाये रखने का प्रण लें और अपने देश को प्रगति पथ पर प्रशस्त करें |

अवनि

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