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एक पेड़ की कहानी

मोहन के पिता जी ने कहा-बेटा यह एक आम का पोधा है, में आज उपहार स्वरुप तुम्है तुम्हारे जन्म दिन पर दे रहा हूं, लो और जाकर अपने खेत की मेढ़ पर लगा दो, और इसका बहुत ख्याल रखना समय पर पानी और खाद देना यह बड़ा होने पर अच्छे स्वादिष्ठ फल और पूरे परिवार को देखा,
मोहन बड़ी सिद्दत से पोधे की देखभाल करता था,पोधा अब धीरे धीरे बड़ा होकर पेड़ बन गया, फिर मोहन के पिता ने मोहन की शादी कर दी, कुछ समय पश्चात पिता का देहावसान हो गया, अब मोहन को अपनै परिवार के अच्छे पालन पोषण के लिए अधिक धन की आवश्यकता थी, वे गांव से शहर आ गये, शहर पास ही था वैसे गांव आते जाते रहते थे, समय चक्र तेजी से चलता रहता है,धीरे धीरे मोहन की संतान भी बड़ी हो चली थी, बच्चे गांव आते थे, तो अपने बाबू(पिताजी)के द्वारा लगाते पेड़ के पास जाते जब फल लगने का समय होता तो वह पेड़ अपने मित्र की संतान को जादा फल देता, मोहन के बच्चें भी पेड़ को बाबा कहकर बुलाते थे, सब बहुत खुश थे, मोहन भी अक्सर पेड़ की कहानी अपनी संतान को बताता था, और इसी प्रेरणा से मोहन के बच्चों ने भी अपने अपने जन्मदिन पर मेसेज ही पोधे रोपित किये थे,
पूरा परिवार ही पेड़ों से पर्याय करता था, मां अक्सर अपने पति के साथ ही शहर में रहती थी, अब मोहन के बड़े बेटे की शादी हो गई थी, और वह अपने परिवार के साथ गांव पर ही रहता था,
एक दिन अचानक मां गांव आई और बेटे से कहा कि तुम्हारे बाबू की तबियत ठीक नहीं है, तुम जाकर बाबू की देख भाल करो मैं अभी गांव में ही रहूंगी, बेटा आज्ञाकारी था, वह शुबह अपने खेत पर गया जाकर अपने बाबा(पेड)से कहा कि बाबा बाबू की तबियत ठीक नहीं है, मुझे उनकी देख देख के लिए उनके पास जाना है, और तभी बेटे की नजर अपने बाबा पर पड़ी , बेटे नै कहा बाबा कल तक तो सब ठीक था , यह एक डाली आपकी अचानक कैसे सूख गई, बाबा ने कहा तुम जाओ जाकर बाबू की सेवा मन लगाकर करो , और मुझे भी अपना कर्त्तव्य पूरा करने दो, यह सब हरा भरा रहना और सूखना नियति है बेटा, बेटा सोचता रहा कि बाबा ने यह क्या पहेली कह दी, पर उसकी समझ में नहीं आया, वह घर आया और अपनी मां से विदा ली बाबू की सेवा के लिए शहर चला गया,
इलाज चल रहा था, चार  छः महीने बीते पर मोहन का स्वास्थ्य और गिरता गया, अचानक एक दिन मोहन का देहावसान हो गया, अब बेटा मोहन का शव लेकर गांव आ रहा था, तभी उसकी नज़र अपने बाबा (पेड़)  पर पड़ी , उसने देखा कि पेड़ पूरी तरह सूख गया है, बेटे से रहा नहीं गया, वह सीधा पेड़ के पास पहुंचा , और पास जाकर पूछा बाबा यह करता तुम सूख गए, पेड़ ने कहा बेटा मुझे अपने कर्त्तव्य का बोध से, मेरा दोस्त तुम्हारा बाबू दुनिया से चला गया, अब उसकी अलर्जी जब तैयार होकर श्मशान जायेगी तब उसका अग्नि सौस्कार होगा, तो उसकी देह को जलने के लकड़ियां चाहिए, इसलिए मैं सूख गया, मेरे सखा मित्र के साथ जलकर अपना कर्त्तव्य पूरा करने के लिए, तुम दुखी मत होना, हम पेड़ है हमारा धर्म ही है, जो है शुख देता है, हम उसके हर दुख में सहभागी होते हैं, अब जब बाबू नहीं रहा तो बाबा भी यहां रहकर क्या करेगा, एक पेड़ की कहानी
डॉ अनंन्त दुबे की कलम से..

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