Sunday Special

आखिर क्यों जाना होगा , तुम्हें दूर !

आखिर क्यों जाना होगा,
तुम्हें दूर,
मेरी आँखों की पहुँच से बहुत दूर,
तुम आखिर कोई सामान तो नहीं हो,
जो उठाया और दे दिया किसी को,
हमेशा हमेशा के लिए,
आखिर क्यों जाना होगा,
तुम्हें दूर !

क्या इतनी ज्यादा मंहगी होगी,
उस दिन की – मेहेंदी,
जो बदले में छीन लेगी,तुम्हें – मुझसे,
कस देगी मेरे तन में – अनगिनत – अदृश्य बेड़ियाँ,
की मैं दुलार भी ना सकूंगा – तुम्हें,
तुम आखिर कोई सामान तो नहीं हो,
जो उठाया और दे दिया किसी को,
हमेशा हमेशा के लिए,
आखिर क्यों जाना होगा,
तुम्हें दूर !

क्या सच में,
लिखा है कहीं की – तुम्हें जाना होगा,
किसने लिखा है ?
क्यों लिखा है ?
मैं नहीं मानता,
बंद कर दूंगा मैं सारे दरवाजे,
वेल्डिंग करवा दूंगा – कुण्डियों पर,
जाम करवा दूंगा,सारी आवाजों को,
तुम आखिर कोई सामान तो नहीं हो,
जो उठाया और दे दिया किसी को,
हमेशा हमेशा के लिए,
आखिर क्यों जाना होगा,
तुम्हें दूर !

क्या सच में तुम्हें जाना होगा,
अपनी मम्मी – दादी – नानी – मौसी – बुआ – चाची – भाभी – ताई की तरह,
आखिरकर जाने कैसे दिया – उनके अपनों ने,
अपने घर की देहरी से,
नाख़ून भर की दूरी से भी दूर,
निमोही – निर्मम – निर्लज्ज,
वे तथा कथित “पुरुष”
वे सब,
क्यों नहीं अड़ गये वो सब “दुर्योधन” की मानिन्द,
सुई की नोंक भी नहीं – इतनी दूर भी नहीं,
बिलकुल भी नहीं,
क्या संभव होगा,
तेरी हाथों के छाप से – खुद को अलग करना,
तुम्हारी बातें – खिलखिलाहट – तुम्हारा हर अहसास,
घुस गया है मेरी धमनियों में
तुम आखिर कोई सामान तो नहीं हो,
जो उठाया और दे दिया किसी को,
हमेशा हमेशा के लिए,
आखिर क्यों जाना होगा,
तुम्हें दूर !

आज ही ले आता हूँ,
कागज और कलम,
बदल के लिख दूंगा सारी रस्में – सारे रिवाज,
कोई विदाई नहीं,
कोई रुलाई नहीं,
हमेशा साथ रहने का नियम,
जो लिख दूंगा – बस लिख दूंगा,
तुम आखिर कोई सामान तो नहीं हो,
जो उठाया और दे दिया किसी को,
हमेशा हमेशा के लिए,
आखिर क्यों जाना होगा,
तुम्हें दूर !

संसार की समस्त पुत्रियों और उनके पिताओं को सादर समर्पित !

अवनि

Tags

Related Articles

Back to top button
Close